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Definitely that was not the last time!

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English

Generally, I'd go more than thousand kilometers away from my boring daily life to figure out someone else's daily life. The Himalayan mountain ranges are over 1500 kms from my hometown Jamshedpur. Whenever I need a break, I go there. I was going to Bhauniyara this time to meet Anita and see her school. The ropeway at Tipri apparently starts at 10am. I arrived early and got down at Pipal Dali.

In Pipal Dali, tea, sweet and vegetable shops are the first ones to open in the morning. Buses and taxies going towards Lambgaon or Ghansali start arriving by 8am. Some passengers sip tea here. It is their ritual at every halt. Some occasional visitors buy sweets for their relatives living in off-route villages. And, some buy vegetables for home because they have stopped growing anything in their courtyards, which are now mostly full of weeds.

I didn't stop here long enough to peek into the daily lives of people idling since morning. They didn't seem to have many options. The road to Lambgaon forked off to left, descended rapidly with a u-turn. I could now see Bhilangna which meets Bhagirathi impounded by the Tehri dam. After crossing the Tehri dam reservoir via the narrow Pipal Dali bridge, I reached Bhauniyara village. Anita was waiting for me at the bus stop.

Anita took me to her one room school for the evening class consisting of about 15 kids. The enthusiatic kids touched her feet in respect. Anita stepped in through a narrow door. The floor was about 2 feet below, the unplastered thick stone wall was not painted and inside was dark because the school could not afford electric connection yet.

The kids quickly cleaned the floor of the open space on the other side of the room. This was actually the roof of the ground floor of an unoccupied house falling into decay. The evening class was to run in sunlight and Anita had only about an hour before it'd get dark. I was there to sense the spirit. At least, that is what I thought I must do to make my trip look purposeful.

When I was there with kids watching them participate in the extra-curricular activities Anita was conducting, I was still a traveller. I knew I was just passing by. If at all, only Anita was responsible for nurturing the dreams kids held in their hearts. I was waiting for the sun to go down.

The night spawned colorful magic. While the host worked hard to arrange for our comfort, I let my fantasies extend into my next visit. It was convenient for me to disregard current indebtnedness and push things far into the future that is always so beautifully promising.

The next day was muddled. I didn't know how to make meaningful contribution. I didn't go to Anita's class. Instead, I left for a village named Madan Negi. But, the ropeway was closed. The clouds had made the river lustreless, and all around I could see listless hillocks down with deep sense of abandonment.

There was a strong urge to leave, and the very next morning I left Bhauniyara. With a pang that I had come completely unprepared. I decided there has to be a next time. I knew for sure that to be at peace with myself, I'll have to come back again to the same dull place, where Anita spends so much time and energy. All alone. I'll have to go there to meet the kids and ask them why they were so happy and excited to meet me last time. I must tell them I was not there just for a picnic. Though I don't yet know what I'd say if they ask why else one'd visit Bhauniyara.

Hindi

सामान्य तौर पर मैं हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर चला जाता हूँ ताकि अपनी नीरस और उबाऊ दिनचर्या से निकल कर दूसरों की दिनचर्या की गुत्थियाँ देख सकूँ। हिमालय की पर्वत-शृंखलाएँ मेरे शहर जमशेदपुर से लगभग 1500 किलोमीटर दूर हैं। अवकाश के लिए मैं वहीं चला जाया करता हूँ। इस बार मैं अनीता जी का विद्यालय देखने भौनियाड़ा जा रहा था। टिपरी रज्जु-मार्ग (रोप वे) की सेवा 10 बजे से शुरू होती है। मैं पहले पहुँच गया था और पीपल डाली पर बस से उतर गया था। 

पीपल डाली में तड़के खुलने वाली दुकानों में चाय, मिठाई और सब्जी की दुकानें प्रमुख हैं। लमगांव या घनसाली की और जानेवाली बसें या टैक्सियाँ  सुबह 8 बजे से यहाँ पहुंचनी शुरू हो जाती हैं। कुछ सवारियाँ  उतरकर चाय पीने में जुट जाती हैं। उनके लिए हर हॉल्ट पर चाय पी लेना आवश्यक होता है। कुछ कभी-कभार आनेवाले लोग सड़क से हटकर रहनेवाले अपने सम्बन्धियों के लिए मिठाई खरीदते हैं। तो कुछ सवारियाँ  अपने घर के लिए यहाँ से सब्जियाँ खरीदकर ले जाती हैं, क्योंकि अब वे अपने बागीचे में अपने-आप उग आने वाली झाड़ियों और खर-पतवार के अलावा कुछ नहीं उपजाते। 

उस निठल्ली सुबह लोगों के विकल्पहीन जीवन में क्या झाँकता ! कुछ रोचक बात न पाकर मैं अगली बस से आगे निकल चला। लमगाँव  की और जानेवाली सड़क घनसाली को जाते  मुख्य मार्ग से कटकर बांयी ओर एकदम पीछे मुड़कर तेजी से नीचे उतर गई। सामने पीपल डाली का पुल  और दाहिनी ओर हरे-नीले पानी वाली झील-सी ठहरी भीलांगना नदी दिखाई पड़े। भारत के सबसे ऊँचे टिहरी बाँध ने भागीरथी और भीलांगना को उनके संगम के पास ही समेट रखा है। एक गाड़ी के गुजरने लायक सँकरे पुल से नदी को पार कर मैं भौनियाड़ा गाँव पहुँचा। नियत गंतव्य तक पहुँच जाने की आश्वस्ति में तुरंत भूल गया कि यह लम्बी यात्रा कितनी निढाल करने वाली थी। 

अनीता जी मुझे एक कमरे वाले विद्यालय ले गईं जहाँ शाम की कक्षा में लगभग 15 बच्चे जमा थे। बच्चों ने उत्साह और आदर से एक-एक कर अनीता जी के पाँव छुए और उनके पीछे-पीछे एक छोटे-से दरवाजे से कमरे में प्रवेश किया जिसकी फ़र्श 2 फ़ीट नीची थी। पत्थर की मोटी दीवारों वाले इस कमरे की पुताई नहीं हुई थी और बिजली का प्रबंध न होने के कारण अंदर अँधेरा था। 

बच्चों ने कमरे की दूसरी ओर की दालान को बुहारकर जल्दी से साफ़ कर लिया और चट्टियाँ  और दफ़्ती के टुकड़े बिछाकर कतार से बैठ गए। यह हिस्सा असल में नीचे सड़क के किनारे बने जर्जर हो रहे घर की छत थी। शाम की कक्षा सूर्यास्त तक ही चल सकती थी और अनीता जी के पास एकाध घंटे ही थे। मैं तो वहाँ बस आशा की व्याप्त सुनहरी छाया को प्रत्यक्ष छूकर देखने गया था। या, कम-से-कम अपने-आप को तो यही कहकर यात्रा की सार्थकता साबित करना चाहता था।

जबतक मैं वहाँ बच्चों को अनीता जी द्वारा कराये जा रहे क्रिया-कलापों में भाग लेते हुए देखता रहा, मेरी दृष्टि एक यात्री की ही रही। मुझे पता था कि यह एक गुजर जानेवाली स्थिति है। बच्चों के ह्रदय में जिन स्वप्नों को अनीता जी ने बुना है, उनके पोषण का दायित्व तो उन्हीं का है। पल भारी लगने लगे और मुझे लगने लगा मेरी तल्लीनता मानों एक स्वांग हो जो सूर्यास्त की प्रतीक्षा कर रही थी। 

रात ने उस मकान पर चारों ओर से रंगों का जादू उड़ेल दिया। जहाँ एक ओर हमारे शहरी विश्राम के यत्न किये जाने लगे, वहीं विश्रांति में मेरी कल्पना यहाँ की मेरी अगली यात्रा तक फैलती चली गई। अभी की कृतज्ञता और ऋण को अनदेखा कर भविष्य कुछ करने का आश्वासन सत्य-असत्य के बीच टंगा एक अनूठा छलावा है!

बदली से भरी अगली सम्भ्रमित सुबह मैं जब तय नहीं कर पाया कि मैं क्या योगदान कर सकता हूँ, तो अनीता जी की कक्षा में न जाकर मैं मदन नेगी गाँव की ओर निकल पड़ा। लेकिन रज्जु-मार्ग बंद था। नदी बादलों की परछाई ओढ़े निस्तेज पड़ी थी और चारों ओर की धूसर पहाड़ियाँ परित्यक्त होने के अवसाद में लेटी थीं। मानों कल की राह देखना भी अर्थहीन हो चला हो !

भीतर भौनियाड़ा को तत्काल छोड़ निकलने का आवेग उठा, और अगले दिन तड़के ही श्रीनगर के लिए निकल पड़ा। ह्रदय में एक तीव्र वेदना लिए कि मैं तैयार नहीं था। बस, मुँह उठाये चला आया था। मैंने निश्चय किया - अगली बार ! अपनी अशांति से छूटने के लिए मुझे इसी नीरस गाँव में फिर आना होगा जहाँ अनीता जी अपना इतना समय और ऊर्जा लगा रहीं हैं। नितांत अकेली। मुझे आकर उन बच्चों से पूछना होगा कि पिछली बार मुझसे मिलने पर वे इतना प्रसन्न और उत्साहित क्यों थे। फिर मैं उन्हें बताऊँगा कि मैं वहाँ केवल पिकनिक के लिए नहीं आया था। वैसे, शायद यह बताना मेरे लिए तब भी संभव नहीं होगा यदि उनमें से कोई पूछ बैठे कि पिकनिक के अलावा कोई भौनियाड़ा क्यों आना चाहेगा भला !

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Very nice !!!

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