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कुछ मन्ज़िले तो ज़रूर होंगी !

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कुछ मन्ज़िले तो ज़रूर होंगी जो मेरे इन्तज़ार में होंगी,
कुछ तो राहें होंगी जो मेरे कदमों के लिए बेकरार होंगी।
कहीं तो सकुं रुका हुआ किसी मंज़िल पे मेरा इंतज़ार करता होगा,
कहीं तो नज़ारों में मेरे ख्यालों का घर बना होगा।
कहीं तो इस शहर से दूर किसी गाँव में मेरा ठिकाना होगा,
दिल कहता हैं उसकी तलाश में कभी तो मुझे जाना होगा।
सोच गर् सोच ही बनी रही तो वो मक़ाम कहां हासिल होगा,
सुबह-शामें यूं ही बीतती रही तो कहां मेरा मुझसे मिलना होगा।
बन खुदगर्ज़ खुद के लिए ज़िये ज़ाने से वो असली सकुं कहां हासिल होगा,
नहीं बनाया गर् बेगानों को अपना तो कहां दूसरा घर हासिल होगा।
वो जो गुम होने को हैं मुझमें मेरा,
गर् नहीं बचाया तो एक दिन बहुत दुख होगा..एक दिन बहुत दुख होगा।

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Thank you Ma`am.

Thank you Ma`am.